Saturday, 21 June 2014

PEET UYA GAAT





पीत हुआ गात



पतझर के पात सा

पीत हुआ गात

प्रिय प्रतीक्षा में

पथ टोहते नेत्रों से

झरने लगे अश्रु।

पातों की शय्या निरख

विरह से /व्याकुलता से /वेदना से

विगलित हुए चक्षु।

बिन बोले ही उड़ गया

छत की मुंडेर पर

बैठा काग।

स्वस्तिक से पावन

प्रिय मन पर

प्रियतमा ने लगा

प्रीत की रोली

गाया भावनाओँ का फ़ाग



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